Saturday, 20 Jun 2026

साध्वीरत्ना, संघरत्ना , प्रवर्तिनी व मेरी मातृसमा साध्वी शशिप्रभाश्री जी ::: प्रदीप चोपड़ा जैन

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स्व. प. पू. प्रवर्तिनी पद विभूषिता श्री पुण्यश्रीजी म.सा. की परम्परा में स्वर्गीय प्रवर्तिनी श्री ज्ञानश्री जी की प्रिय एवं सुयोग्य शिष्या प्रवर्तिनी श्री सज्जनश्रीजी म.सा. की प्रमुख शिष्या प पूज्य खरतरगच्छअधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभ सूरीश्वरजी जी मसा की आज्ञानुवर्तिनी प्रवर्तिनी  महोदया बंग प्रदेश उद्धारिका, वात्सल्य मूर्ति,  सदा एगलठाना महातपाराधिका, सदा तत्पर विधिपूर्वक संयम-साधना प्रेरिका, श्रमणी रत्ना, संघरत्ना प्रवृतिनी महोदया श्री शशिप्रभा श्री जी म.सा का संक्षिप्त जीवन परिचय। 

नाम:-किरण कुमारी 

पिता:- श्री ताराचंद जी गोलेछा 

माता:-श्रीमती बाला देवी गोलेछा 

गांव:फलोदी (राजस्थान)

जन्म:-विक्रम संवत 2001 भाद्र वद अमावस्या 

दीक्षा:-विक्रम संवत 2014 मिगसर वदी छठ 

दीक्षा स्थान:-ब्यावर

दीक्षा गुरूवर्या:साध्वी शिरोमणि श्री सज्जन श्री जी म सा 

दीक्षा नाम: साध्वी श्री शशिप्रभा श्री जी

संघ रत्ना उपाधि:-विक्रम संवत 2060 को संघरत्ना की उपाधि से विभूषित 

देवलोक गमन: -विक्रम संवत 2081आषाढ़ वदी पंचमी कोलाघाट (खड़गपुर पश्चिम बंगाल)

किरण कुमारी ( शशिप्रभाश्री जी का जनम नाम)   को 10 वर्ष की आयु में दीक्षा लेने के भाव कैसे आ गए  ??

गुरुवर्य्या श्री जी ने  स्वयं  फ़रमाया कि यह  कोई पूर्व  जनम के प्रबल संस्कार  थें   तब  उनके मन मे  दीक्षा के  भाव  जगें । 

उस उम्र में उन्हे  विराट विशाल जैन दर्शन  का  या जीव - अजीव या नव तत्व का कोई विशेष ज्ञान नही था  बस एक ही लगन थी कि दीक्षा लेनी है, दीक्षा लेनी है, बस दीक्षा लेनी ही है। 

१० वर्ष की आयु में, गुरुणी सज्जन श्री जी के संपर्क में आने के बाद एक ही भावना थी दीक्षा लेने की । 


मां ने सहमति दे दी लेकिन किसी व्यक्ति ने गुरु वर्य्या श्री के छोटे भाई से कह दिया कि तेरे पास दौलत नहीं है इसलिए तेरी बहन दीक्षा लेना चाहती है। लघु भ्राता को आवेश आया और उसने मां से कहा कि यदि बा‌ई दीक्षा लेंगी तो मैं पानी में डुब कर अपनी जान दे दूंगा।

मां ने पूरी दृढ़ता से कहा कि मेरी बेटी सही काम कर रही है। 

जब उसके दीक्षा लेने के भाव हैं तो मैं उसकी राह में बाधक नहीं बनूंगी। तू भी मत बन । 


बचपन के संस्कार :: 

कभी कभी हमारे  गुरुवर्या श्री  की  मां कहती थीं - अरे! आज प्रतिक्रमण नहीं हुआ , मेरे तो लाख रुपए चले गए __  बड़ा नुक़सान हो गया ।

नन्हीं किरण पूछतीं थीं - क्या!  प्रतिक्रमण करने से लाख रुपए मिलते हैं ?

तो मां समझातीं कि लाख का तो फिर भी मूल्य है लेकिन प्रतिक्रमण का कोई मोल नहीं । प्रतिक्रमण की कीमत आंकना संभव नहीं है । 

।। महाराजसा के प्रेरक  उपदेश ।। 

(१) 

सामयिक  ,  आयम्बिल्,   जाप व तपस्या  पर   प्रेरणा देती रहती  थी।पूराने जमाने में श्रावक-श्राविकाएं  उपाश्रय में आकर पौषध लेते ,   प्रतिक्रमण  करते और  साधु-साध्वियां उन्हें गौतम रास , भक्तामर पाठ, सप्त स्मरण, शत्रुंजय रास ,आदि सुनाया करते थे। आज  स्थितियां काफी बदल गई है । 

शास्त्रों में 1 सामयिक का लाभ 1 लाख सोने की मोहरों के दान से भी क‌ई गुणा ज्यादा  बताया गया है । 


1 सामायिक करना यानी 48 मिनट के लिए 84 लाख जीव योनि के जीवों को अभय दान । 

उदाहरण के तौर पर यदि अचानक पुलिस हमारे घर/दुकान के सामने अचानक आ जाए तो हम घबरा जाते हैं, ठीक वैसे ही 84 लाख जीवयोनियों के जीव हमसे घबराते हैं, कांपते रहते हैं। 

हम जैसे ही ठाणेणं, मोणेणं, झाणेंण,अप्पाणं वोसिरामि कहते हैं ..............जगत के सारे जीव सामायिक के उन 48 मिनट के लिए हमसे पूर्णतः भयमुक्त हो जाते हैं । 

प्रत्येक श्रावक-श्राविका को कम से कम एक सामायिक तो प्रतिदिन करनी ही चाहिए। 

सामायिक कैसे करनी - उपयोग और विवेक से। हम सभी को प्रत्येक क्रिया में उपयोग और विवेक रखना है। हमारे शास्त्रों में _उपयोगे धर्म:_  बताया गया है। जहां उपयोग है, वहीं धर्म है।

(२) 

हमने पहले के भवों में बहुत शुभ कर्म किये हैं , दान ,तप, शील आदि का पालन किया है ,तब जाकर हमें अच्छा कुल , परिवार, उत्तम साधन , स्वस्थ शरीर मिला है । हमें अति शुभ कर्म किए हैं तब जाकर ये पांचों इन्द्रियां स्वस्थ मिली हैं वरना  संसार में ऐसे सैंकड़ों लोग मिलते हैं , जिनको मनुष्य भव तो मिला, मगर शरीर स्वस्थ नहीं रहता, इंन्द्रियां सही काम नहीं करतीं। 

क्या कारण ? चिंतन मनन करें, ..

मम्मण सेठ को याद करें ।

पूर्ण भावोल्लास से गुरु भगवंत को मोदक (लड्डू)  वोहराया और परिणाम स्वरूप   पुण्य अर्जन किया ।

लेकिन कुछ समय बाद मित्र के  मुख से मोदक की तारीफ सुनकर एवं बचे-खुचे मोदक के दानों को चखकर , मोदक वोहराने का अफसोस  करने लगा ।

भाव से वोहराने के फलस्वरूप  पुण्य से धन-दौलत तो खूब मिली , लेकिन बाद में भाव बिगड़ने के कारण प्राप्त संपत्ति को भोगने का सौभाग्य नहीं मिला । 

और दूसरी तरफ नयसार और शालीभद्र को याद कीजिए।


 नयसार के जीव को भोजन करने से पहले  संत को वोहराने की तीव्र भावना हुई  और योगानुयोग संत पधारे ।

भाव से वोहराया, आगे गांव तक जाने का रास्ता बताया और परिणाम...... सम्यकत्व की प्राप्ति की ।

शालीभद्र के जीव ने पूर्व भव में पूर्ण भाव से साधु भगवंत को खीर वोहराई और परिणाम ...............हम सभी जानते हैं... 

ध्यान रखें - शालीभद्र के जीव ने जिन वाणी नहीं सुनी थी ,केवल  सेठों ( जिनके घर वो अपनी मां के साथ जाया करते थे) को साधु-साध्वियों को वोहराते देखा था ।

भावों के  परिणामों को समझें।

संसार के सब कार्य करें,बस रस मत डालें ,आसक्त न हों । 

हम छद्मस्थ हैं तो भूल होना स्वाभाविक है। लेकिन जैसे ही कोई भूल हो तुरंत मिच्छामि दुक्कडम्, मिच्छामि दुक्कडम् , मिच्छामि दुक्कडम् ..........

मम्मण सेठ को भी पुण्य से खूब रिद्धि सिद्धि मिली और शालीभद्र को भी .......

दोनों ने भाव से साधु को वोहराया था लेकिन

पहले ने सुकृत करके पश्चाताप किया और दूसरे ने सुकृत करके अनुमोदना की । हम इस फर्क को समझें।

इसलिए हमेशा शुभ कर्म करें और शुभ भावों में रहें। 

हम अच्छे कार्य कर के आये हैं , यहां भी पूरे भाव से अच्छे कार्य करें , भगवान महावीर की वाणी के अनुसार चलने का हम सभी प्रयास करें ताकि  जल्द से जल्द हम  सर्वज्ञ बनें, सिद्ध गति को प्राप्त करें......

।। शंका समाधान के कुछ प्रसंग ।। 

एक श्रावक ने  गुरुवर्य्याश्री से  पूछा ::   हृदय में  समता कैसे आये ?

महाराजसा ने बताया की  ::

सहने और सुनने की प्रेक्टिस करें। किसी भी बात पर उलझें नहीं। यदि कोई बड़ा आपसे कुछ कह रहा है और वो बात आपके मन माफिक नहीं भी है तो भी जवाब मत दें , चुपचाप सुन लें। जवाब देना अति आवश्यक हो तो  धीमी आवाज में, बिना आवेश के, सधे शब्दों में , नम्रता पूर्वक अपनी बात रखें। 

यदि उम्र में आपसे छोटे किसी ने कुछ कह दिया तो भी आवेश नहीं, आक्रोश नहीं बस समता पूर्वक सुने और फिर शांति से विचार कर के ही जवाब दें। 

जीवन में समता  लाने का एक और प्रयोग  :

किसी ने कुछ कह दिया तो   सोचें मेरा क्या गया? 

किसी के  बुरा कहने से मैं बुरा नहीं होने वाला। किसी के अच्छा कहने से मैं अच्छा नहीं होने वाला। मैं तो समता के सागर महावीर के पथ का राही हूं। मेरे महावीर ने तो कानों में कील ठोंकने वाले पर भी करुणा बरसायी थी। फिर मुझे तो किसी ने कुछ अपशब्द ही कहे हैं ,  मैं क्या समता से इतना भी नहीं सह सकता!!!!

इस तरह से यदि आपका चिंतन चलता है और छोटी- मोटी बातों को समता से सुनने की आदत यदि आप डाल लेते हैं तो हृदय में  समता धीरे धीरे अवश्य आयेगी ।

।। साध्वी जीवन ।। 

आपने संयम जीवन में प्रवेश करते ही जैन दर्शन में आचार्य धर्म दर्शन, तत्व आदि शास्त्रों का गहनता पूर्वक अध्य्यन किया और उच्च अध्य्यन करने पर आपको व्याकरण शास्त्री के पद से सम्मानित किया गया। आप एक उच्च श्रेणी की विदूषी और प्रखर व्याख्यात्री हैं। आप एक अनुशासनप्रिय, संघ विकास में सेवारत, दृढ़ मनोबली, तप जप- संयम परायणी, अप्रमतचेता एवं प्रवचन पट्ट हैं। आपको हिन्दी, संस्कृत, गुजराती एवं राजस्थानी भाषाओं का ज्ञान हैं।

।। आपके विचरण क्षेत्र।। ::  राजस्थान, गुजरात, थाली प्रदेश, उत्तरप्रदेश, मेवाड़, बिहार, बंगाल, छत्तीसगढ़, आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक ,  महाराष्ट्र  ,  ओड़िसा  एवं तमिलनाडू आदि क्षेत्र रहे हैं। इसके अलावा बंगाल, बिहार प्रान्त के जन मानस में जैन धर्म का विशिष्ट रूप से बीजारोपण किया है। 

।। प्रेरणा :: निर्माण।। 

थली प्रदेश में मन्दिरों एवं दादावाड़ियों का जीर्णोद्धार आपकी प्रेरणा का प्रतीक स्वरूप है। 

सिद्धाचल महातीर्थ पर सांचा सुमतिनाथ जिनालय का भव्य जीर्णोद्धार आपनी की प्रेरणा से सम्पन्न हुआ है। इसके फलस्वरूप वि.सं. 2060 में पालीतणा महातीर्थ पर प. पू. उपाध्याय प्रवर श्री मणिप्रभसागरजी म.सा. द्वारा आपश्री को "संघरत्ना"  की उपाधि से विभूषित किया गया है। 

पूर्वांचल ज्योति  बंगभूमि उद्धारिका तपस्वीरत्न सरलमना  गुरुवर्या श्री शशिप्रभाश्री जीका  इसतरह   अचानक  कालधर्म प्राप्त होना  बंगाल मे  जैनधर्म  के अभ्युदय / पुनर्जागरण के  लिए अपूरणीय  क्षति है ।।

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जिनशासन की   जगमग  ज्योति  ,     शीतलनाथ भवन,  दुर्गापुर जैन मन्दिर,  बोलपुर जैन मन्दिर, रामपुरहाट उपाश्रय, कोलकाता जिनेश्वरसूरी मन्दिर व भवन, दुर्गापुर श्री जिनदत्तसूरी भवन ,  चिन्सुरा जैन मन्दिर ,   हावड़ा  जैन भवन आदि आदि परम पूज्यनीया शशिप्रभाश्री जी  की प्रेरणा से निर्मित  हुआ।

सैंथिया मे  श्री जैन मन्दिर  आदि  का जीर्णउद्धार  उन्ही के प्रेरणा से हुआ।

शाजापुर दादाबाड़ी का जीर्णोद्धार भी उनके ही प्रेरणा से संपन्न हुआ।

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प्रात:स्मरणीया परम पूज्यनीया  भगवान महावीर  के उपदेशों को जनजन तक पहुंचाने वाली   जगमग ज्योति  जिनशासन की शान स्वर्गीया मातृसमा शशिप्रभाश्री जी महाराज द्वारा धर्म-चातुर्मास   पूरे भारत मे सर्वत्र  हुआ था। 

सकल श्री जैन समुदाय के सभी गच्छों के श्रावक-श्राविकाओं ने  आपश्री  व आपके  अनुवर्तिनी  विदुषी  साध्वीबहनों   द्वारा  प्रवहमान   धर्म देशना, सत्संग,  स्वाध्याय, तप ,  जप  तपस्या आदि का लाभ उठाकर  अपार आनन्द का अनुभव किया जो इतिहास में मिसाल बन गया  है।

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आर्यिका रत्न  शशिप्रभाश्री माताजी के पावन श्री चरणों में कोटि कोटि नमन वंदन ।

माँ शशिप्रभाश्री  माताजी के गुणगान करना सूरज को दीपक दिखाने के समान है।

तन से दूरी हो सकती है माँ आपसे, पर मन की दूरी हो पाना कठिन है। 

आर्यिका मां शशिप्रभाश्री जी भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं!

उन्हें अहिंसा व सत्य  की प्रतिमूर्ति कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी l

ऐसी माँ के चरणों की रज प्राणियों को अभयदान देने मे समर्थ ..

प्रदीप चोपड़ा जैन

अध्यक्ष : भारतीय जैन अल्पसंख्यक समाज (प.बंगाल) 

संस्थापक व पूर्व महामंत्री : श्री जैन समाज दुर्गापुर

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